घोर कलयुग
यूँही नहीं कहा करते इसे घोर कलयुग ये न तो अपने युग में सुधार कर रहा, अपितु पिछले युगों पर भी सवाल पर सवाल खड़े कर रहा| नहीं है इन्हें रावण की नियत पर आपत्ति, अपितु कहते हैं माँ सीता ने क्यों हठी बन स्वर्ण मृग मांग मोल ली विपत्ति| यूँही नहीं कहा करते इसे घोर कलयुग ये स्वयं में झाँक कर न देख रहा, अपितु इतिहास पर भी प्रश्नचिन्ह लगा रहा| करते हैं ये द्रौपदी का जमकर तिरस्कार, नहीं मानते दुर्योधन और दुशासन को महाभारत के युद्ध का ज़िम्मेदार, ऐसे हैं ये धर्म के ठेकेदार| नहीं करते ये एक पल भी स्त्रियों की पवित्रता और समर्पण पर विचार| यूँही नहीं कहा करते इसे घोर कलयुग ये स्त्रियों पर अत्याचार पर अत्याचार होते देख रहा, कुकर्मियों को और बढ़ावा दे रहा| समाज में स्त्रियों के साथ अधर्म का देख रहे हैं ये तमाशा, परन्तु न्याय की नहीं है इनको कोई अभिलाषा, स्त्रियों पर पाबंदी लगाने में है इनकी अधिक जिज्ञासा| दिल क्रोध से भर जाता है सुन कर, जब मिलती हैं खबरें फिर उठा ले गया कोई दुष्ट एक स्त्री को जबरदस्ती कर, क्यों हम बैठे हैं हाथ पे हाथ रख कर| क्यों हम चुप हैं जैसे लेटे हों अर्थी पर, क्यों हर बार स्त्री की रक्षा हेतु नारायण को अवतरित होना पड़ता है इस धरा पर| क्या हमारा स्वयं का कोई दायित्व नहीं? क्यों हम इन पीड़िताओं की पीड़ा समझते नहीं? क्या करुणा और मानवता का कोई मोल नहीं? क्यों इन घोर अपराधों का अंत नहीं?
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