छाँव में विश्वास
विजय शर्मा एरी — उसी भावनात्मक यात्रा को दर्शाते हुए, जहाँ उपहास से आत्मविश्वास तक का सफ़र होता है:🌿 कविता: "छाँव में विश्वास"I. पेड़ों की छाँव तले तुम बैठे, धीरे‑धीरे शब्द मुझे पढ़ाते, अक्षर नाचते, अर्थ छिप जाते, पर तुमने हाथ थामे, राह दिखाते।II. पन्ने चिढ़ाते, स्याही अजनबी, मतलब धुंधले, राह अनजानी, फिर भी तुमने गिरने न दिया, धैर्य तुम्हारा दीवार बना।III. हँसी उड़ाते, नाम पुकारते, "नालायक! मूर्ख!" सब दोहराते, पर तुम्हारी आँखों में ज्वाला थी, जिसने मेरी शर्म को जला दी।IV. धीरे‑धीरे, कदम दर कदम, सीख मिली, बनी अमूल्य धन, हर ठोकर ने शक्ति जगाई, हर टूटा शब्द तुमसे जुड़ाई।V. पेड़ों की छाँव बनी मेरी ढाल, जहाँ विश्वास ने किया कमाल, मज़ाक की आवाज़ें मौन हुईं, तुम्हारे भरोसे से साँसें जुड़ीं।VI. दुनिया चाहे ताने मारे, तुम्हारी आशा ने पंख उतारे, मैं ऊपर उठा, साहस पाया, आँखों में उजियारा छाया।VII. जो शब्द कभी धोखा देते, अब सहज बहते, गीत बनते, "मूर्ख" कहे जिस बच्चे को, अब कविता लिखे, सत्य कहे।VIII. हँसने दो उन्हें, गूँज मिटे, मैं चलता हूँ शक्ति लिए, पेड़ों की छाँव में जो मिला, स्वयं को पाया — तुम्हारे सिला।यह हिंदी संस्करण उसी भाव को जीवित रखता है — उपहास से आत्मविश्वास तक की यात्रा, और गुरुजन/साथी के विश्वास से मिली शक्ति।
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