ना जाने कहां गये वो दिन..
एक ऐसा दौर हुआ करता था जब चीजें जैसे थी वैसी लगती थी न फ़िक्र का धुंधलापन न आँखों में खंजर की तैयारी थी जो कल तक दीन दुनिया से सीधे साधे थे आज उनके हाव भाव में कुछ अद्भुद सा है जो दुनिया को एक नए नज़र से देखा करते थे आज उनके आंखों में स्वार्थ की चमक सी है जो लोग सच बोलने से डरते नहीं थे वही छुप छुप कर झूठ को छुपा रहें हैं जो नेता कल को सुधार करने वाले थे आज उन्हीं की बोलती बंद सी लगती है जो समस्याओं का समाधान करने चले थे आज उनकी तबियत थोड़ी खराब सी लगती है जो अंधे न होकर भी अंधे बनते फिरते हैं क्या उनको कोई नई बीमारी तो नहीं है ??
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