संभावनाओं के सागर में
संभावनाओं के सागर में, गोते लगाती चलती ज़िंदगी। आगे तैरते अनगिनत सपने, उनके पीछे भागती ज़िंदगी। एक उम्मीद— शायद ये हकीकत बन जाएं, हर बार लगता— अब पकड़ में आएं, अब पकड़ में आएं। पर एक लहर आती है, और बहा ले जाती है सब, सपने छिटक जाते दूर— फिर खोजती है कोई द्वीप, जहां थोड़ा ठहराव मिल सके। भटकते-भटकते कभी इतनी दूर निकल जाती है ज़िंदगी, कि घर का रास्ता भी धुंधला पड़ जाता है। कुछ के हाथ सपने लगते हैं, पर वे हकीकत से दूर हो जाते हैं। और पीछे— घर में पसरा सन्नाटा, जहां अपनों ने अपने सपनों की कुर्बानी दे दी, सिर्फ उनकी राह तकते-तकते। और कुछ— थके-हारे, आशियाना न पाकर, लौट आते हैं वहीं, जहां से चले थे कभी।
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