ज़ज्बात
उसकी बातें सुनकर स्तब्ध था सलीके से एक-एक बात बता रहा था वो जिंदगी और मुक्ति के संघर्ष की कहानी अपनी जुबानी समझा रहा था वो। मैं सुन रहा था हुंकारी और खुले प्रश्नों के साथ उसके चेहरे के हाव भाव को पढ़ रहा था मैं अचानक उसने कहा शायद जिंदगी हार जाता मौत का जीतना शायद मुझे मुक्ति दे जाता । पीड़ाओं से मुक्ति का एक प्रयास किया अब और पीड़ाओं की नयी गठरी मिला बोझ दिल पर बढ़ता ही जा रहा अब तो अब तक जीवन में न कोई रोशनी मिला । पर वो संघर्ष दुबारा झेल नहीं सकता वो छटपटाहट बर्दास्त नहीं कर सकता पर गुस्सा भी तो नियन्त्रण में नहीं आता क्या करें कुछ भी अब समझ नहीं आता। बदल गयी है दृष्टि दुनिया की अब और भी कुछ अच्छा कुछ और बुरा व्यवहार बदला अपनों की संवेदना में बनावटीपन झलकता है इस जीवन में प्यास ही प्यास बूंद नहीं दिखता है।
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
