वक्त
जो भी किया, वक़्त पर भरोसा रखकर किया, इसी ने आबाद भी किया, इसी ने बर्बाद भी किया। कुछ कदम स्वार्थ ने चुपके से उठवाए, कुछ कर्म ने बिना सोचे हमसे करवाए। राहें कभी आसान थीं, कभी काँटों से भरी, मंज़िल खामोश रही, पर कोशिशें चलती रहीं । नियत डगमगाई तो इरादों ने संभाला, हर गिरावट ने हमें फिर से उठना सिखा डाला। वक़्त गवाह है, हर सोच, हर चाल, हर बात का, कर्म हिसाब रखता है, हर दिन और हर रात का । अब देखना है मंज़िल किस राह मिलती है, सीख बनकर उभरती है या सज़ा बनकर खिलती है। यक़ीन है — जो बोया है वही लौटकर आएगा, वक़्त की अदालत में सच ही जाएगा ........
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