अगर चांद घटता न बढ़ता
अगर चाँद घटता न बढ़ता, न होती कोई अमावस, हर रात उजली चादर ओढ़े, सजती रहती पूनम-सी। पर फिर कैसी होती वो तड़प, जो चाँद के संग बढ़ती है, अँधियारे के उस छोटे क्षण में, रोशनी ही तो निखरती है। यही तो जीवन का नियम है— घटता-बढ़ता हर एहसास, नित पूनम भी अच्छी नहीं, जरूरी है थोड़ी-सी अमावस।
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