काव्य धारा
ये चंचल मन, अखंड ब्रह्मांड का पथिक, क्षण भर में ही न जाने कहाँ-कहाँ हो आता है। कल्पनाओं के आकाश से अनगिनत चित्र समेट लाता है, सूक्ष्म अनुभूतियों के रंग भर, अंतरतम में उन्हें बसाता है। फिर बुद्धि का मंथन चलता है, विचारों का गहरा संधान, सत्य-असत्य, सार-असार का होता है मौन विवेचन-ज्ञान। जब निचुड़कर शुद्ध भाव निकलते हैं, अंतर की अग्नि में तपकर, वही अमृत-से शब्द बन, कविता बनकर बहते हैं। नन्द गोपाल अग्निहोत्री ✍️
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