सफेद कोट का काला सच
ये अस्पताल नहीं साहब, पहाड़ों का कत्लखाना है, यहाँ गरीब का आना मतलब, सीधे श्मशान जाना है। सुबह से शाम ढल गई, पर डॉक्टर का अता-पता नहीं, मरीज तड़पकर मर गया, क्या ये कोई खता नहीं? वो सफेद कोट पहनकर, जो एयरकंडीशन में सोते हैं, उन्हें क्या पता पहाड़ के लोग, कैसे अपनों को खोते हैं। फाइलों में तुम्हारी स्वास्थ्य सेवा, नंबर वन कहलाती है, पर हकीकत में यहाँ की एम्बुलेंस, बस लाशें ढोकर लाती है। तुम बजट डकार जाते हो, तुम दवाइयां बेच खाते हो, मशीनें धूल फांकती हैं, तुम बस कागज़ चमकाते हो। कुर्सी पर बैठे उन भेड़ियों को, अब ज़रा भी शर्म नहीं, इंसान की जान बचाना, अब इनका कोई धर्म नहीं। आज उस स्ट्रेचर पर, एक उम्मीद ने दम तोड़ दिया, सिस्टम की लापरवाही ने, एक हँसता घर उजाड़ दिया। लानत है ऐसे शासन पर, ऐसी झूठी सुविधाओं पर, जहाँ डॉक्टर नहीं मिलते, बस लाशें मिलती हैं राहों पर।
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