पहाड़ का विलाप
पहाड़ की छाती फटी है, और आँखों में सैलाब है, मरती हुई इन साँसों का, साहब! क्या जवाब है? अस्पताल की उस चौखट पर, कोई माँ दम तोड़ गई, नन्ही सी एक जान को, इस दुनिया में छोड़ गई। खटिया पर है लाड़ला, और कोसों दूर दवाई है, साहब! तेरे सिस्टम ने, बस मौत यहाँ उगाई है। बूढ़ा बाप वो हाँफ रहा है, चढ़ाई की उस मोड़ पर, बेटे के काँधे काँप रहे हैं, इस हकीकत की जोड़ पर। दवा की जगह धूल भरी है, उन सरकारी शीशियों में, इंसान यहाँ बस मरता है, विकास की कोशिशों में। सायरन की आवाज़ यहाँ, बस ख़्वाबों में ही बजती है, पहाड़ की उस डोली में, लाश ही रोज़ सजती है। एम्बुलेंस का पहिया थमा, पत्थर की उन राहों में, दम तोड़ दिया उस बच्ची ने, अपनी माँ की बाँहों में। खटिया पर है लाड़ला, और कोसों दूर दवाई है, साहब! तेरे सिस्टम ने, बस मौत यहाँ उगाई है। तुम मखमली गद्दों पर सोओ, हमें कफ़न भी कम मिलता, पहाड़ की इस माटी में, अब फूल नहीं कोई खिलता। जागो रे! कि ये सिसकी अब, बददुआ बन जाएगी, तुम्हारी अंधी कुर्सी को, ये मिट्टी ही खा जाएगी।
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