पहाड़ का सिसकता आँचल
पहाड़ का पानी, पहाड़ की मिट्टी, अब आँसू बन बहती है, अस्पताल की सूनी चौखट, अपनी व्यथा ये कहती है। न डॉक्टर है, न दवा मिली, बस दीवारों का घेरा है, मेरे पहाड़ की किस्मत में, क्या इतना ही अंधेरा है? कंधों पे डोली उठती है, पर एम्बुलेंस का नाम नहीं, साहब! क्या पहाड़ के इंसानों का, कोई मोल-काम नहीं? वो गर्भवती माँ तड़प उठी, पर राहें पथरीली थीं, साँसों की डोरी टूट गई, जो पहले ही ढीली थी। मासूम की किलकारी गूँजी, पर अस्पताल तो बंद पड़ा, विकास का झंडा ऊँचा है, पर इंसान यहाँ बेबस खड़ा। कंधों पे डोली उठती है, पर एम्बुलेंस का नाम नहीं, साहब! क्या पहाड़ के इंसानों का, कोई मोल-काम नहीं? खंडहर बन गए स्वास्थ्य केंद्र, जहाँ जाले लगे पुराने हैं, तुम्हारी फाइलों में तो साहब, बस झूठे ही अफ़साने हैं। वो बूढ़ी आँखें थक गई हैं, अब बाट जोहते-जोहते, तुम महलों में सोते हो, हम अपनों को यहाँ खोते। कंधों पे डोली उठती है, पर एम्बुलेंस का नाम नहीं, साहब! क्या पहाड़ के इंसानों का, कोई मोल-काम नहीं? जागो ओ पहाड़ के लोगो! अब ये सिसकी न सहना तुम, इस गूंगी-बहरी सरकार से, अपना हक अब कहना तुम। करुणा अब अंगार बने, और सिस्टम को झकझोर दे, पहाड़ का ये मौन विलाप, अब सत्ता का मुख मोड़ दे!
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