"यौवन का अभिषेक"
नयनों में तेरे सावन की, घनघोर घटा सी छाई है, अधरों पर तेरे कुमकुम की, लाली ने ली अंगड़ाई है। जब मलय-पवन के झोंकों संग, ये केश तुम्हारे उड़ते हैं, लगता है अंबर से भू पर, कोई अप्सरा उतर आई है। तेरी कंचन सी काया पर, यौवन का चंचल पहरा है, तेरा रूप किसी सरिता जैसा, जिसका तल अति गहरा है। तू कली खिली कोई उपवन की, मैं भँवरा सा मँडराता हूँ, तेरे चेहरे की आभा देख, चाँद का भी मन ठहरा है। जब कंकण की झंकार उठे, और नूपुर धीमे बजते हैं, मेरे मन के सूने आँगन में, मधु-उत्सव नित सजते हैं। तेरी चितवन के तीर प्रिये, सीधे अंतर तक जाते हैं, तुझे देख जगत के सब वैभव, फीके-फीके से लगते हैं। तू रागिनी है मेरे मन की, मैं तेरा ही अनुगामी हूँ, तू पूर्ण सत्य की मूरत है, मैं भ्रम का एक नमामी हूँ। हम एकाकार हुए ऐसे, ज्यों शब्द और अर्थ मिले हों, तू अर्द्धांगिनी मेरी प्रिय, मैं तेरा अंतर्यामी हूँ।
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