पहाड़ की पुकार ❤️💝
खामोश है पगडंडिया सन्नाटा अब खेतों में सोता है आज खुद को देख कर यूं अकेला देखकर मेरा पहाड़ रोता है घर के दरवाजों पर बड़े बड़े ताले लटके हैं एक रोटी की तलाश में हम दूर शहरों में भटके हैं वह चूल्हा अब ठंडा पड़ चुका है जहां कभी खुशिया पका करती थी आज खुद को अकेला पाकर पहाड़ की माटी बहुत रोती हैं अब खेतों में अब लहलहाती फसल नहीं अब बड़ी बड़ी झाड़िया उगी है जहां कभी बचपन की किलकारियां सजा करती थी आज वहां खामोसिया छाई है गांव का एक आदमी अपनी बुढ़ी मां से कहता हुआ= मां -यहां की बड़ी बड़ी दीवारें मुझे आज भी कैद लगती है शहर की भाग दौड़ में मुझे गांव की बहुत याद आती है ढूँढता हूँ वो ठंडी हवा, जो रूह को मेरी छू जाए, काश! फिर से वो बचपन वाली, मिट्टी की खुशबू मिल जाए "ओ पहाड़ के बच्चों लौट आओ, ये मिट्टी तुम्हें पुकारती है, तुम्हारे बिना ये देवभूमि, अपनी पहचान हारती है।
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