पत्थर की मूरत
हवाएँ सर्द थीं और लफ़्ज़ों में दुहाई थी, मेरे हिस्से में बस, अपनों की रुसवाई थी। वो 'मान' का लिबाज़ मुझे इस तरह पहनाया गया, कि मेरी ही मैय्यत पर मुझे, मुस्कुराना सिखाया गया। आँखों में समंदर है, पर बहने की इजाज़त नहीं। अब इस अकेलेपन से बड़ी, कोई शिकायत नहीं। सबने खुशियाँ चुनीं, मैंने बस ख़ामोशी ओढ़ ली, तन्हाई की राह पर, खुद से ही सूरत मोड़ ली।
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