कठिन परिश्रम।
हर सुबह इंतज़ार तेरा रहता है, हर धूप तेरी याद दिलाती है। मासूम चिड़ियों का चहचहाना, मुझे बेहाल करता है। तू आत्मा है, और मैं रूह, तेरा आने का अजब सा एहसास होता है। पहेली तेरी उन आँखों में, जो अंदर ही अंदर छुप रही है। तरस रहा हूँ हर सपने को जीने के लिए, पंखों को खोलने और आसमान को छूने के लिए। धूप में बदन तपता रहे या तन भीगता रहे, लक्ष्य की ओर बढ़ना, मैंने छोड़ा नहीं। परिश्रमों से ही जीवन बढ़ा है, तू रख हौसला, आसमाँ को झुकाना है। न बना इतने बहाने कि कर नहीं सकता, ठहर सा गया था हृदय, मन भटकता रहा राहों में, परंतु मैंने चलना छोड़ा नहीं। जिस मंजिल की तलाश थी, वो मंजिल भी मिल गई। कि मन था चंचल, हृदय था प्रिय, परंतु मैंने झुकना न सीखा, हर मुसीबत में उम्मीद जगाई, अंत में जीत मिली। ।।कवयित्री: दीक्षा खंडवाल।।
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