रफ़ीक़
एक बात याद रखना… आप जो भी करें, जैसे भी करें, मुझे आप पर यक़ीन है, हार मत मानो, हौसला न हारो, कोशिशों में ही मंज़िल की एक नई राह है। ये ज़िंदगी आज़माती बहुत हैं, कभी ठहराकर, कभी गिराकर संभालती भी , हैं, जो थामे रखते हैं हौसलों का हाथ, माधव खुद उनकी सारथी बन आते हैं, राहों में चाहे जितनी भी हों उलझनें, वो खुद मंज़िल तक पहुँचाते हैं। आपकी मंज़िल चाहे जो भी हो, मैं राहों में साथ हूँ, आप छोड़ें या थामें मेरा हाथ, मैं साए की तरह साथ हूँ। मैं कोई मौसम नहीं जो बदल जाऊँ, अगर सांसों ने छोड़ा हाथ, तो दुआओं में साथ हूँ।
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