मां
घर की आपाधापी में मां मौन है। जब कोई आता है ,घर, और पूछता है की ये जो औरत है ,घुघट, में वो कौन है मन पसीजता है , ये देख कर की जो सबसे खास है वो सबकी नजरों में आम कैसे बन जाती है ये माँ ,हर बार खाने में पीछे क्यों रह जाती है पोछ लेती हर है, हर आंसू, जो उसकी आँखों में आते है वो हर बार मुस्कराती हुई दिखाई देती है क्या कहे ,वो संतान से जिसे उसने नौ माह कोख में पाला है जिसे ,सीने से लगा के ,गीला , सूखा,भूख ,प्यास बिताया है । साहब ,वो मां है वो किसी को कोई दर्द नहीं बया करती अगर रहा जाए ,बेटा - बेटी भूखा ,तो अपने हक़ की भी रोटी दे देती। मेरे गाँव जाने से वो खुश हो जाती है । जब तक रहती हु ,गांव में रोज नया पकवान बनाती है कभी खीर,पूड़ी,हलवा ,पकौड़ी,दाल बाटी चूरमा तो कभी मूंग का हलवा बनाती है । वो मुझे ही नहीं ,सबको खाना खिलाकर जो बचता है ,उसे खाती है । साहब वो मां है जो खुद रो कर भी खुद सबको हंसाती है।
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