आंखें
मेरे लफ़्ज़ों की बस्ती में सन्नाटा पसरा रहता है, जो दिल में है, वो जुबां तक कभी आ ही नहीं पाता। मैं चाहूं भी तो कह नहीं सकती अपनी कैफियत, पर मेरी आंखें हज़ारों दास्तां सुनाती है हर पल अगर तुम पढ़ सको तो मेरी आँखों को पढ़ लेना, इनमें वो शिकायतें भी हैं जो कभी कागज़ पर न उतरीं, और वो मुहब्बत भी, जो ज़माने को समझ नहीं आती। शब्द तो केवल छलावा हैं, अक्सर बदल जाते हैं, पर आँखें वो आईना हैं जो कभी झूठ नहीं कहतीं। मेरे खामोश लहजे में, सैकड़ों सवाल पलते हैं, जो लफ्ज़ जुबां तक नहीं आते, वो अश्कों में ढलते हैं। मेरी रूह की लहरें तो आँखों के साहिल पर बहती हैं। कभी गहरी उदासी है, कभी एक अनकहा सा सुकून, कभी इनमें इंतज़ार है, तो कभी बेशुमार जूनून सा है , मैंने सीखी नहीं वो कला कि बातों से दिल जीत लूं, मैं तो बस मौन रहकर अपनी दुनिया तुम पर वार दूं। गर तुम पहचान सको मेरे अश्कों की ज़ुबान को, तो समझोगे कि चुप रहकर भी मैंने क्या कहा है। मेरी खामोशी ही दरअसल मेरा सबसे बड़ा इज़हार है, जिसे लफ़्ज़ों से ज़्यादा, रूह को समझना आता है। बस एक बार गहराई से देख लेना मेरी इन आँखों में, तुम्हें वो सब मिल जाएगा, जो मैं कह न सकी उन रातों में।l
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