स्त्री का प्रेम ।
दिन ढले शाम ढले तेरे प्रेम के तले छांव में रही. तू चला गया राह में अकेला छोड़ कर (2) तो क्या हुआ राह में भी तेरी राह देखेंगे. तू कहता था कि प्राण बसते है, तुम्हारे भीतर मेरे तुमने मेरे ही शरीर से आत्मा को विछोह कर दिया तड़पने के लिए. आंखें छलक गई अश्रुओं की बारिश हो गई. तेरे नाम से बहने लगे तू जाता रहा, हम रोकते रहे, तू जाता रहा कि हम रोकते रहे पर पता क्या था तू भी मुझे रास्ते का काटा समझ गया. बह गए अश्रु अत्यधिक तुझे दया न आई, (2)॥ तू मुझे लाचार समझता गया मैं तुझे जीवन पूर्ति. अर्धांगिनी कहा मुझे तूने परन्तु तू अर्धांग बन न सका. समेटकर तेरी यादों को कैद कर लिया हृदय में स्वयं के. परमेश्वर जैसा प्रेम करा, ॥ चरण स्पर्श कर माथे पर सजाया सिंदूर की तरह. पूर्ण हुई मैं स्त्री पुरुष से परन्तु परमेश्वर की तरह, प्रेम तू कर न पाया ॥ कवयित्रीः दीक्षा खंडवाल.
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