कारोबार दिल का
कारोबार ये तेरे दिल से मेरे दिल का, अजब भी है,, और ग़ज़ब भी। तेरे ज़िक्र के बिन ये दिल अधूरा सा रहता है, शायद तेरे दिल का आलम भी कुछ ऐसा ही होता हो। लबों पर तेरा नाम आते ही जो सुकून उतरता है, सोचती हूँ, गर कभी निगाहें मिल जाएँ, तो उस लम्हे का हुस्न क्या होगा। कभी गर तू रूबरू आ गया, उफ़!!! क्या कहना उस पल, उस वक़्त का। जैसे आसमान सिमट आए किसी रूमाल में, जैसे सागर ठहर जाए इक प्याले में। वक़्त भी शायद अपनी रवानी भूल जाए, और ख़्वाब हक़ीक़त का लिबास ओढ़ लें। जैसे ठहरे हुए जल की आग़ोश में चाँद अपना अक्स सँवार ले, जैसे हिमालय की बर्फ़ीली चादर पर ब्रह्मकमल अपनी ज़ीनत बिखेर दे। और उस एक लम्हे में, शायद दबी ख़्वाहिशों को परवाज़ मिल जाएँ, दुआएँ मुकम्मल हो जाएँ, और पूरी क़ायनात दो दिलों की रूहानी सदाओं के दरमियाँ सिमट आए।
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