अदावत ऐ सुकून
बहकी-बहकी हुई जज़्बात का हुनर कैसा, दिल ही रुक जाए कहीं, फिर होगा असर कैसा। अपने क़ाबू में नहीं हैं ये मेरी यादें, ये जिस्म, ये रूह, ये दिल— मेरा कैसा। जिस्म अपनी ही हरकत में नहीं रहता, एक नफ़्स की ग़ुलामी में है इंसाँ ऐसा। बातें करने का ख़याल अक्सर आया, मगर सुना किसने मुझे, अपने भी कहाँ अपने जैसा। कट रही है उम्र लम्हा-दर-लम्हा न सुकून कभी आया, सुकून जैसा। नहीं है अपना कोई इस दुनिया में, ऐ 'अक्श', रूह ही हो जाए अगर अदावत, तो सुकून कैसा।
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