ख़्वाहिशों के धागे
ख़यालों के समंदर में जब भी उतरती हूँ, तुम ही मोती बन हाथ आते हो। जोड़-जोड़ कर हर एक को ख़्वाहिशों के धागे में पिरोती हूँ, जाने क्यों हर बार बिखर जाते हो। लफ़्ज़ों की चौखट पर तुम्हारा नाम सजाती हूँ, मगर पढ़ने बैठूँ तुम्हें, तो धुँधले से नज़र आते हो। सितारों की चमक में, बादलों की चादर में, हर तरफ़ तुम्हारे ही निशाँ पाती हूँ, मगर जाने कहाँ चाँद बन छिप जाते हो। सोचती हूँ एक रोज़ अपनी ज़िद से तुम्हें मुकम्मल कर लूँगी, अपने हर अधूरे ख़्वाब की तरह, मगर तुम तो ख़्वाबों से भी ज़्यादा अधूरे समझ आते हो। ख़यालों के समंदर में जब भी उतरती हूँ, तुम ही मोती बन हाथ आते हो, और जब तुम्हें अपना समझकर दिल के ख़ज़ाने में रखना चाहती हूँ, तो रेत की मानिंद उँगलियों से फिसल जाते हो।
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