मुक्तक
वो बारिश का पानी ,वो कागज की नाव छप छप से कूदे ना थकते थे पाँव मोहल्ले की टोली संग छत पे नहाना बहुत याद आता है वो गुजरा जमाना । ......कवि शैलेन्द्र सिंह चंदेल
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