प्रकृति को स्वीकार करो।
प्रकृति भी भीषण प्रतिशोध लेती है, तुम काटते हो जीवन की श्रृंखला, वो तुम्हारे जीवन को आग और पानी में डुबोती है। तुम छेड़ते हो उसकी प्राकृतिकता, वो तुम्हारी कृत्रिम दुनिया से खेलती है। हर दफ़ा तुम्हें समझाती है - अपनाओ उसे जैसी वो है, तरक़्क़ी के नाम पर शोषण करना बंद करो। पर तुम अपनी जेब में हीरे भरने को धरती को बंजर करते हो, चाँद-सितारों की चाहत में सूरज को बेचा करते हो। सोचते हो जीत लोगे प्रकृति को, पर भूल जाते हो - वही श्वास है, वही जीवन है, वही इस सृष्टि का आधार है। अंजाम होगा एक अनचाहा अंत तुम्हारा, तुम तो जीकर उड़ जाओगे, पर अपनी नई पीढ़ी से सब कुछ छीन जाओगे। रुको, ठहरो, सोचो, फिर स्वयं में सुधार करो। चाहते हो राम सा जीवन, तो राम बन, प्रकृति को स्वीकार करो।
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