ख़ूब है।
बर्क़ संग बारिश की यारी भी ख़ूब है, धरती से मिलने बूँदों की तैयारी भी ख़ूब है। चुपचाप शाख़ों में बैठे परिंदे भी ख़ूब हैं, हरे-भरे दरख़्तों की सरशारी भी ख़ूब है। कलरव करती नदिया का बहता पानी भी ख़ूब है, झरनों में शक्कर-सी घुलती फुहारें भी ख़ूब हैं। आँखों से मौसम की रंगत पीते इंसाँ भी ख़ूब हैं, कुहासे में लिपटे पहाड़ों की ख़ूबसूरती भी ख़ूब है। कुदरत की हर अदा में रब की तहरीर भी ख़ूब है, हर ज़र्रे में बसी उसकी रहमत की फ़नकारी भी ख़ूब है।
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