तुम
तुम्हें चाहने की ख़ातिर मुझे तुम्हारी ही ज़रूरत नहीं, अजीब है ना, मगर सच है। मैंने ख़यालों में अपने एक तुम बनाया है, हूबहू तुम-सा, या शायद तुमसे भी बेहतर। जो हमेशा मेरे साथ रहता है, मैं उदास होती हूँ तो मेरा मन बहलाता है, परेशान होती हूँ तो धीरज बँधाता है। मैं अगर दिन कहूँ, तो मुझे रोशनी दिखाता है, और रात कहूँ, तो सुकून का मतलब समझाता है। बेहद अपना सा लगता है मुझे वो, अजीब है ना, मगर सच है। वो मुझे मुझसे ज़्यादा समझता है, जितनी मैं उससे मोहब्बत नहीं करती, उससे कहीं ज़्यादा वो मेरी चाहत करता है। और शायद इसी लिए, तुम्हें चाहने की ख़ातिर मुझे तुम्हारी ही ज़रूरत नहीं।
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