मौन की और लौटना
:🌌 कविता: मौन की ओर लौटना विजय शर्मा एरी. हम लौटेंगे मौन की गोद में, जहाँ शब्द भी थककर सो जाते हैं, स्मृतियों से पहले की वह शांति, जहाँ आत्मा अपने स्वर को पाती है।स्मृति बनने से पहले का क्षण, सबसे गहरा, सबसे पावन धन, वह पल जब जीवन सांसों में है, और प्रेम अभी भी पासों में है।मौन में छिपा है सत्य अनंत, जहाँ न कोई प्रश्न, न कोई वचन, सिर्फ आत्मा का निर्मल प्रकाश, जो मिटा देता हर दुख का आभास।स्मृतियाँ तो समय की परछाईं हैं, जो धीरे‑धीरे धुंधली हो जाती हैं, पर मौन है शाश्वत, अडिग, अचल, जो हर हृदय को देता संबल।जीवन की यात्रा है क्षणिक सी, हर मोड़ पर बदलती तस्वीरें ही, पर मौन की गहराई में उतरकर, हम पाते हैं शांति का अमृत भर।स्मृति बनने से पहले का आलिंगन, सबसे सच्चा, सबसे गहन संग, वह क्षण जब आत्माएँ मिलती हैं, और मौन में प्रेम की धारा बहती है।तो लौट चलें उस मौन नगर में, जहाँ न कोई दूरी, न कोई डर में, सिर्फ आत्मा का संगीत गूँजे, और हर पीड़ा धीरे‑धीरे सूझे।मौन ही है अंतिम ठिकाना, जहाँ स्मृति भी बनती बहाना, वहीं आत्मा पाती है विश्राम, और जीवन हो जाता परिपूर्ण धाम।✨ यह कविता आपके दिए गए भाव को विस्तार देती है — मौन, स्मृति और आत्मा की यात्रा को आठ पदों में।क्या आप चाहेंगे क
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