दोस्ती या इश्क़ ?
एक दूर के चाँद की चाहत में, मैं अपने घर का दीया बुझा बैठा, फ़क़त एक सूरत की ख़ातिर, मैं एक मुकम्मल सीरत गँवा बैठा। वो पहरों की बातें, वो साथ ढलती हुई सुकून की शामें, बिन लफ़्ज़ों के जो पढ़ ली गईं, वो अनकही सी दास्तानें। वो गहरा इश्क़ था, जिसे मैं सिर्फ 'दोस्ती' का नाम देता रहा, मैं अपनी ही आँखों से सच चुरा कर, खुद को फरेब देता रहा। एक हसीन छलावे की ओर, मैंने बेवजह ही कदम बढ़ाए थे, उस एक बेईमान रात ने, मेरे सारे झूठे भरम गिराए थे। जब उस दूर की प्यास ने ठुकराया, तो मैं लौट आया उसी छाँव में, पर मेरे उस एक धोखे का ज़हर, उतर चुका था उस सच्चे घाव में। टूट गया वो ऐतबार, जो उसने बड़ी फुर्सत से बुना था, मैंने नादानी में वो रास्ता चुना, जो कभी नहीं चुनना था। अब वो पत्थर सी सर्द है, और मैं मोम सा पिघल रहा हूँ, अपने ही हाथों लगाई आग में, मैं हर रोज़ जल रहा हूँ। रातों की नींदें छिन गई हैं, और आँखों में बस मलाल है, "काश वो वक़्त पीछे मुड़ जाए..." बस यही एक सवाल है। जो एक दूसरे की रूह से वाकिफ़ थे, आज वो अजनबी होकर गुज़रते हैं, वो अपनी ज़िद पर कायम है, और हम अपने ही पछतावे में मरते हैं।
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