बेमिसाल मोहब्बत
यकता मोहब्बत अपनी, मुनफ़रिद तेरी मुस्कान, नायाब सा ये ताल्लुक़, पुरअसरार मेरा अरमान। हमकलामी का सिलसिला क्या चला, दिल अपना हार बैठी, रूह की ख़ामोश बस्ती में, तेरा नाम पुकार बैठी। ना रिवाजों की कोई ज़ंजीर, ना रवायतों का कोई जहाँ, फिर भी तेरी कशिश में, खो बैठी अपना आसमाँ। यकता मोहब्बत अपनी, मुनफ़रिद तेरी मुस्कान, नायाब तू, पुरअसरार तू, और तुझ पर दिल क़ुर्बान।
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