देवभूमि का रक्त रंजित आँचल
पहाड़ की उस शांत कोख से, एक ज्योति जागी थी, बाप की बूढ़ी आँखों में, इक आस नई जागी थी। पढ़-लिखकर वो बेटी निकली, घर का मान बढ़ाएगी, वो क्या जाने भेड़ियों की, नज़र उसे लग जाएगी! वो वीर प्रसूता की बेटी, देवभूमि की लाली थी, जिसके संकल्पों के आगे, हर बाधा मतवाली थी। पर सत्ता के उन भूखे व्याघ्रों ने जाल बिछाया था, नारी के पावन गौरव पर, हाथ गंदा उठाया था! नेता का वो बिगड़ा शहज़ादा, मद में चूर खड़ा था, अंकिता के स्वाभिमान से, उसका पाप बड़ा था। उसने झुकना नहीं सीखा, उसने रुकना नहीं सीखा, गुलदार की उस बेटी ने, मरना चाहा पर बिकना नहीं सीखा! हाय! वो शासन, हाय! वो सत्ता, जो न्याय को डसती रही, कातिल की उन काली करतूतों पर, पर्दा वह कसती रही। सबूतों पर बुलडोजर चला, पर जन-आक्रोश न थमेगा, बेटियों के लहू का हिसाब, अब चप्पे-चप्पे पर जमेगा! हुंकार भरो ऐ वीरों तुम, अब मौन तोड़ना होगा, न्याय की उस मशाल को, घर-घर जाकर जोड़ना होगा। जब तक अंकिता को इंसाफ न मिले, ये आग नहीं बुझेगी, पहाड़ की बेटी की चित्कार, अब महलों में गूँजेगी!
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