निज़ाम
है परवाह किसे किसकी यहाँ, सब जुमलों का बाज़ार है, बात-ए-आम को मुद्दा-ए-ख़ास बनाना ही चाल है। मुद्दा-ए-ख़ास को आम-सी आवाज़ बतलाते हैं, चेहरे सफ़ेद रखते हैं, दामन में दाग़ छुपाते हैं। कुर्सी के नीचे रहते तो बदलाव की बातें करते, आरूढ़ होते ही उसी कुर्सी पर, सियासी रंग में ढलते। तोड़-मरोड़ कर हर फ़ैसले को जनहित बतलाते हैं, उस जनहित की ओट में अपना ही हित साध जाते हैं। अंधेर नगरी है, आख़िर किस-किस से आस करोगे, जिस पर भी विश्वास करोगे, एक दिन पश्चाताप करोगे। धुँधला-धुँधला हर मंज़र है, धुँधला सारा राज़ यहाँ, कब तक आखिर नए सूरज की राह तकोगे? जुगनू बन, अँधेरों में भी उजियारा फैलाना होगा, हाथों में हाथ लेकर अपना हक़ जतलाना होगा। हारोगे तो तजुर्बों से जीत की राह निकलेगी, जीत गए तो उस जीत की असली क़ीमत समझोगे। पर रहना होगा बेदाग़ सदा अपने किरदार में, तभी तो सचमुच बदलाव आएगा इस निज़ाम में।
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