हिसाब
बहुत हुई इश्क़, मोहब्बत, प्यार, क़रार, वफ़ा-जफ़ा की बातें, चलो अब कुछ उलझे हुए हिसाब करते हैं। आँखों से शुरू जो सौदे हुए थे, अब उनका अस्ल अंजाम लिखते हैं। अपनी कहानी के तुम को, तुम रख लो, बेहिसाब बहती मैं को मैं रखती हूँ। फिर रह जाते हैं ख़्वाब, ख़्वाहिश, सुकून, जज़्बात, अरमान, हसरतें, और बहुत कुछ हम में, करना क्या है इनका, चलो ये सवाल करते हैं। कुछ अधूरे लफ़्ज़ पड़े हैं अब भी रूह की तहों में, आओ उन्हें ख़ामोशियों के नाम करते हैं। जो दर्द तुम्हारे हिस्से का था, वो तुम ही रखो, हम अपने ज़ख़्मों को अब कमाल करते हैं। बहुत दौड़ लिया तेरी यादों के वीरान रास्तों पर, चलो अब ख़ुद से भी थोड़ा विसाल करते हैं।
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