समंदर
उसकी याद में इतना रोया मैं, कि आँखों की राप्ती सूख गई। लोगों ने पूछा "क्या सचमुच सूख गई?" मैं मुस्कुराया और बोला नहीं, वह सरयू बन गई। फिर आँखों से राप्ती नहीं, सरयू बहने लगी, अपने साथ बहाती हुई स्मृतियों के टूटे हुए तट। मगर सरयू भी एक दिन थक गई, और गंगा बन गई। गंगा की धारा में दर्द, विरह और प्रतीक्षा साथ-साथ बहते रहे। वह बहती रही निरंतर, दिनों से वर्षों तक, वर्षों से युगों तक, जब तक कि वह एक अथाह समंदर न बन गई। अब मेरी आँखों में एक समंदर रहता है, जो हर रात ज्वार बनकर उठता है, और हर सुबह खामोशी के तट पर बिखर जाता है। यह समंदर कभी सूखता नहीं, शायद सूखेगा भी नहीं। क्योंकि जिस दिन इसकी अंतिम लहर भी थम जाएगी, उस दिन स्मृतियों का अंतिम दीप बुझ जाएगा, जीवन का अंतिम गीत रुक जाएगा, और मैं समय की धारा छोड़, यम के पथ का यात्री बन जाऊँगा।।
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