सपनों की अर्थी -अंकिता भंडारी
"पहाड़ों की गोद और डोभ-श्रीकोट की माटी से निकली थी वह लड़की, अपने माता-पिता के असीम दुलार में बड़ी हुई थी वह लड़की। अपने पैरों पर खड़ा होने का हौसला लेकर घर से निकली थी वह लड़की, आँखों में हज़ारों रंगीन सपनों को सजाकर निकली थी वह लड़की अपने निर्धन मां-बाप की लाडली थी वह लड़की अपने सपनों को पूरा करने के लिए निकली थी वह लड़की क्या पता था किसी को कि फिर लोट कर नहीं आ पाएगी वह लड़की और अपने सपनों के बीच दब कर मर जाएगी वह लड़की भले चली गई इस माटी को छोड़ कर यह लड़की पर आज भी इंसाफ मांगती है वह लड़की उस गांव के हर कण की पुकार है वह लड़की क्या हमसे इंसाफ भी मांग सकती है वह लड़की
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