पोस्टमार्टम
मेज़ पर पड़ी है एक लाश, दम तोड़ चुकी इस सभ्यता की, जो कल तक ओढ़े थी दुशाला, अपनी तथाकथित 'संस्कृति' की। चीरा जब लगा पहली बार, तो भीतर से अहंकार बहा, जिस 'संस्कार' का ढिंढोरा था, वो खोखला और लाचार रहा। आँखों में जमी थी वो नफ़रत, जो जात-पात पर पलती थी, और ज़ुबान पर चुपके से, औरों की निंदा चलती थी। फेफड़ों में भरी थी घुटन वही, जो बेटियों का दम घोटती थी, और हाथों की सूजी नसें, अधिकारों को सदा नोचती थीं। दिल के भीतर जब झाँका तो, सिर्फ़ स्वार्थ का काला ज़हर मिला, जिस समाज को कहते थे 'महान', वहाँ हर कोना बेअसर मिला। यह पोस्टमार्टम जारी है, हर सच अब बाहर आएगा, यह झूठी 'संस्कारी' सभ्यता, अब खुद को कहाँ छुपाएगा ? नस-नस में फैला खोखलापन, दिखावे का सब खेल यहाँ, ऊपर से गंगाजल जैसा, भीतर नफ़रत की जेल यहाँ। कंधों पर ढोते झूठी शान, जो ज़रा सी छुअन से हिलती है, पर हक़ की खातिर उठती आवाज़, इसकी आँखों में खटकती है। चमड़ी के नीचे छिपे मिले,दहेज़, दंभ और लालच के घाव, मज़हब के नाम पर बहता लहू, और सियासत का गंदा दाँव। अब ढँक न पाओगे इस शव को, मर्यादा की इस चादर से, खुद अपनी ही नज़रों में गिरकर, तुम जी न सकोगे आदर से।
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