ख़्वाब
मेरी नींदों में रहते सपने भी अजीब हैं, कभी कोई हिरन मेरे पास ठहर जाता है। तो कभी नटखट तितलियाँ मुझे घेर लेती हैं, नदियाँ ख़ुद इठलाकर मेरे पास आ बहती हैं। और हवाएँ मुझसे ही राह पूछ बैठती हैं, गोया मेरी चाहतों में मासूमियत पिरोती हैं। उन सपनों की हर हलचल में, मानो मैं भी सजीव हो जाती हूँ। भूल बैठती हूँ असली दुनिया, बस ख़्वाबों में ही जीती हूँ। तभी सूरज थपकी देकर जैसे मुझे नींद से जगाता है, लाली-सी किरणों से अँधेरों को धीरे-धीरे भगाता है। सपनों से बिछड़ने की वही मासूम-सी नाराज़गी, मानो हर सुबह मेरे चेहरे पर उतर आती है। और लोग पूछ बैठते हैं, कोई बुरा ख़्वाब देखा था क्या? अब क्या बतलाऊँ, ख़्वाब तो दिल के क़रीब था, बस छूट गया है।
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