मैं अपने आप को खो रही हूं
मैं अपने आप को खो रही हु। हर दिन भूल रही हु अपनी अहमियत हर दिन चुन रही हु कांटे कांटो के जख्म अब बांटे नहीं जाते। में ऐसी नहीं थी मेरी पहचान अलग है । जो मंजर मेरे सामने मेरे अस्तित्व का वो गलत है। मेरा परिचय कराते मैं खुद को देख रही थी। टूटे फूटे अक्षरों से कहानी जोड़ रही थी। कभी बहुत बोलती कभी इक दम चुप हो जाती मेरी आंखों में सूखा समंदर रह गया। न कोई नदी मिलती न कोई लहर आती । चलो जब भूल रहे है तो सब भूल जाते है । रोना हंसना रूठना चीखना सब भूल जाते है। फेंक देती हु सारे। शिकवे शिकायत दूर कही मैं खुद अपनी ही अग्नि में जलना चाहती हु मैं अब मौन रहना चाहती हु हर दिन में हर पल में अपने आप को डोह रही हू मैं अपने आप को खो रही हूं। नेहा फौजदार
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