शौर
शौर ================= शौर यहा बहोत है...... , काॅफीला नीकल चुका था, आवाज दबी दबी , यहा अभी भी कानाफुसी चल रही थी. कीतनो को लुटा, उसने, रंक से राजा बनने के लिये, वतन तक का सौदा कर डाला, कुछ कागज के नोट के लिये. आलम ये था बदनामी नही वो तो सच था...... , वो तो काम कर गया था, अब तो खामोशी थी...!, और कुछ बातें दबी दबी..सी..., लाखो लोगऔर काना फुसी..., ऍकष्न के नाम मर धब्बा...., अब फकत शौर था........ वो भी दबदबा सहमासा...... शोर..... था..... शोर था,..... --------------------
Ad
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
Shop Now →
