मौसम
मौसम ने बदली है रंगत, ओढ़ी चादर हरियाली की। सूरज ने भी आँखें नीची कर ली हैं, मानो धरती से मांगी माफ़ी है। देखो जिधर भी, आँखों को सुकून मिलता है, जैसे धरती आसमान का ख़्वाब सँवरता है। खुश हैं सारी दिशाएँ, नाच रही फ़िज़ाएँ, नया और बेहतर करने की चाह में मगन हर जीव यहाँ। हल्की-हल्की फुहारों ने मन ललचाया है, उस पर भी पपीहे की पुकार ने जी बहलाया है। सूरजमुखी संग गुलाबों ने आँखों को प्यार सिखाया है, रजनीगंधा ने तो मानो रोम-रोम महकाया है। कलियों ने फिर से मुस्काना सीख लिया है, सूखी डालों ने भी लहराना सीख लिया है। भीगी माटी की सौंधी खुशबू ने पैग़ाम सुनाया है, हर पतझड़ के बाद यहाँ सावन फिर से आया है|
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