कभी यूँ भी हो
कभी यूँ भी हो कि उनके दिल के दरीचे पर मेरी यादों की दस्तक हो। कभी यूँ भी हो कि उन यादों के आँचल में सिसकती हमारी रुस्वाइयाँ हों। कभी यूँ भी हो कि उन रुस्वाइयों के ज़ख़्मों पर मुलाक़ातों का मुकम्मल मरहम हो। कभी यूँ भी हो कि उन मुलाक़ातों की जन्नत में उल्फ़त की ज़ीनत हो। कभी यूँ भी हो कि उस उल्फ़त की कहकशाँ में वफ़ा के चाँद, ऐतबार के सितारे हों। कभी यूँ भी हो कि उन सितारों की झिलमिल में हर गिला, हर शिकवा ख़ामोश हो। कभी यूँ भी हो कि ख़ामोशियों के लम्हों में निगाहों से सारी दास्ताँ बयाँ हो। कभी यूँ भी हो कि उन निगाहों की ज़ुबाँ पर उम्र भर की सर्गोशियाँ मुक़द्दर हों।
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