क्या तू वही है,जो कभी था यहीं!
कुछ यूं बिखरा हूं ज़िंदगी में, कि अब ख़ुद का पता नहीं। तमाम गलतियों का पिटारा हूं, बेसुध पड़ा बंजारा हूं। चेहरे पर मुस्कान रखी है, अंदर से मगर बिखरा हूं। महफ़िल में सबके साथ खड़ा, फिर भी कितना तन्हा हूं। हर किसी की उम्मीदों पर, शायद मैं खरा उतर न सका। जो अपना था, वही एक दिन, मुझे समझ ही न सका। कभी ख़ुद से लड़ता हूं, कभी तक़दीर से हार जाता हूं। कुछ सपनों की लाश उठाकर, हर रोज़ मुस्कुराता हूं। अब शिकायत भी किससे करूं, जब ख़ता मेरी भी कम नहीं। आईना भी सवाल करता है— "क्या तू वही है, जो कभी था यहीं?" मंज़िल की तलाश में निकला था, रास्तों में ही खो गया। दुनिया को अपना बनाते-बनाते, मैं ख़ुद से ही दूर हो गया। फिर भी दिल के किसी कोने में, एक चिराग़ अभी जलता है। शायद एक नया सवेरा, मेरे हिस्से भी निकलता है।
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