मेरे अल्फाज
कुछ एहसास खत्म नहीं होते दफन किये जाते हैं ! उम्मीदों की परवाह नहीं की जाती ,, उम्मीदें मरोड़ दी जाती हैं.......! आप और आपकी बातें गंभीरता से नहीं..... वैकल्पिक तौर पर ली जाती हैं......! डोर खिंचते-खिंचते उस स्थिति में आ जाती है...... जहाँ से आगे जबरदस्ती खींचना भयावह प्रतीत होता है! खुद तक समेटी गई भावनायें निकलती हैं विरान समय में................! जिसके बाद सूझता तो कुछ नहीं............. लेकिन मन ढूढ़ता है बस एकांत.......... सिर्फ और सिर्फ एकांत....!
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