सुख
आज कोई बड़ी जीत नहीं मिली, बस शाम को हवा अच्छी थी, चाय ठीक बनी थी, और घर लौटते वक़्त आसमान ने कुछ देर तक अपने रंग नहीं बदले। पहले मैं ऐसे दिनों को साधारण समझकर छोड़ देता था, अब लगता है सुख शायद शोर नहीं करता, बस धीरे से आकर दिन के किसी कोने में बैठ जाता है। अब जब भी कोई दिन बिना किसी उपलब्धि के ढलता है, मैं उसे ख़ाली नहीं कहता, शायद सुख का स्वभाव ही ऐसा है वह दरवाज़ा नहीं खटखटाता, अपना परिचय नहीं देता, वह बस मौजूद रहता है, चाय से उठती भाप में, खिड़की से आती हवा में, थके हुए दिन के बाद मिलने वाली ख़ामोशी में।
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