प्रेम का सार।
मेरे एक दोस्त ने मुझसे पूछा, ये बात आज तक समझ नहीं आई जब कृष्ण भगवान थे, तो राधा को खुद से दूर होने क्यों दिया, और शिव चाहते तो सती को पुन:जीवित कर सकते थे, महाकाल होकर मृत्यु से उन्हें छीन सकते थे। जब दोनों के पास शक्ति थी, सामर्थ्य था अपार, फिर प्रेम के आगे क्यों नहीं किया उस शक्ति का प्रयोग एक बार?! मैने हल्की सी मुस्कान के साथ कहा - जिस प्रेम को पाने के लिए शक्ति का प्रयोग करना पड़े वो प्रेम कैसा?! कृष्ण चाहते तो राधा मिल जाती, पर तब क्या विरह भक्ति बन पाता? शिव चाहते तो सती लौट आती, पर तब क्या त्याग का अर्थ जग पाता? दोनों ने प्रेम को अधिकार नहीं, आदर बनाया। अपनी शक्ति से नहीं अपनी धैर्य से उसे अमर बनाया। जो प्रेम बल से जीता जाए वो प्रेम में और युद्ध में क्या फ़र्क रह जाता? बल से जीता हुआ प्रेम- इतिहास तो बन सकता है, लेकिन उपासना नहीं। शक्ति अगर हर अश्रु रोक दे, तो अश्रु का सम्मान कहाँ? और हर बिछड़न का अंत कर दे, तो विरह का वरदान कहाँ?! प्रेम को अगर साथ से तोलते तो, कृष्ण आज भी राधा के बिना अधूरे कहलाते, और शिव का स्मरण सती की अग्नि के बिना नहीं होता। मोह साथ मांगता है, मगर प्रेम सिर्फ एहसास मांगता है। इसीलिए हर युग में, गूँजे उनका नाम— राधा में कृष्ण बसें, शिव में सती का धाम। प्रेम जिसे ताकत चाहिए, वो समय संग ढल जाएगा, प्रेम जो मर्यादा चुन ले, वही युगों तक अमर कहलाएगा। -साक्षी शर्मा
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