दिल का रिश्ता
कुछ तो अलग है तुझमें, जो दिल का रिश्ता बन गया, भीड़ तो लाखों की थी, मगर तू जैसे अपना बन गया। कहते हैं रिश्ते ख़ुदा बनाता है, फिर ये कैसा रिश्ता था जो ख़ुद बन गया, ना नाम मिला, ना कोई पहचान इसे, फिर भी हर एहसास में बस गया। ना वादे थे, ना कोई शर्तें थीं, फिर भी हर मोड़ पर साथ चल गया, अनजाना सा था शुरू में सब कुछ, और धीरे-धीरे अपना सा लग गया। ना जाने कैसे जुड़ गए ये धागे, जो दिल से दिल तक सिल गए, कुछ तो अलग है तुझमें, जो मेरी कहानी का सबसे ख़ूबसूरत हिस्सा बन गया। जब भी तन्हाइयों ने घेरा, तेरा ख़याल हमसफ़र बन गया, ख़ामोशियों में भी तेरी मौजूदगी का, एक मीठा सा असर रह गया। ना दूरी दरार बन पाई, ना वक़्त कुछ बदल सका, जो रिश्ता लफ़्ज़ों में न बंध पाया, वो दिल में हरदम बढ़ता रहा। कुछ तो अलग है तुझमें, जो यूँ ही नहीं अपना बन गया, मेरी दुआओं, मेरी मुस्कानों, और मेरी कहानी का हिस्सा बन गया।
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