झल्ली
हार को मेरी अपने गले लगाता है, जीत में मेरी मुझसे पहले वो मुस्कुराता है। झल्ली, बताता है यूँ तो मुझे, पर ख़ुद को मुझ पर ही लुटाता है। रिश्तों की किताब में ऐसा कहाँ कोई मिलता है, जो हर दर्द में भी हँसकर जीना सिखाता है। मेरी ख़ामोशियों को बिना कहे पढ़ जाता है, मेरे हर ग़म को हँसकर अपना बनाता है। मेरे ज़हन में हर पल उसी का नाम आता है, वो मेरी रूह में सुकून बनकर उतर जाता है। मोहब्बत क्या है, ये दुनिया से क्यों पूछूँ, वो साथ हो तो हर लम्हा इबादत बन जाता है। इल्म ज़रा भी नहीं उसको मेरी चाहतों का, फिर भी उसका साथ आसमाँ के सितारों सा है। अगर मुकम्मल किसी दुआ का मतलब है, तो वही शख़्स मेरे मुक़द्दर में आ जाता है।
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