कौन हूँ मैं?!
कौन हूँ मैं! कभी लगता है ये दौड़ जिन्दगी का शिकार हूँ कभी सुकून से भरा समंदर हूँ। कभी आजाद हूँ कभी पिंजरे में बैठा पंक्षी हूँ सच बताना... कौन हूँ मैं? कभी खुश हूँ कभी उदास हूँ, कठपुतली हूँ? कौन हूँ मैं, कभी हवा में उड़ती पतंग हूँ कभी चाय में डूबी बिस्कुट हूँ (कौन हूँ मैं, चलो जैसी भी हूँ, बस मस्त हूँ मैं।) मैंने खुद को परखने में खुद को खो दिया। जैसे वेद को पहचानने में डोन को खोया था। हर दिन एक ही, काम करने में खुद को खो दिया हूँ। कौन हूँ मैं, वो जो बना हूँ या बनना चाहता हूँ। मैं आजाद पंक्षी की तरह उड़ना चाहता हूँ पर सपनों में बंध जाता हूँ सपना क्या है नौकरी करना, या आजादी है सपना तेरा? पर अब इस उलझन को सुलझाना होगा। मुझे खुद से ही, फिर मिलना होगा ख्वाब अब पिंजरा नहीं, मेरे पंख बनेंगे मुझे आजाद आसमान में फिर उड़ना होगा!
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