बाढ़ का दानव
🌊 करुणामय कविता : "बाढ़ का दानव" (लेखक – विजय शर्मा एरी, अजनाला, अमृतसर) बेख़ौफ़ बादल जब बरसते, नदियाँ सीमाएँ भूल जातीं, छोटे छोटे गाँव, बस्तियाँ, पलभर में जल में डूब जातीं। बाढ़ का दानव आ जाता है, निर्दयी, निष्ठुर, निर्मम बनकर, किसानों के सपनों की फसलें बह जातीं आँसुओं में घुलकर। नन्हें बच्चे बिलख रहे हैं, माँ की गोद तक डूबी जाती, बुजुर्गों की आँखें पूछ रहीं – “क्या यही हमारी किस्मत है साथि?” मवेशी तिनकों से चिपके हैं, झोंपड़ियाँ लहरों में टूट रहीं, कोई छत पर बैठा रोता है, कोई नाव में यादें बाँट रहा। राहत की नावें कहाँ मिलेंगी? कहाँ मिलेगा सूखा अन्न? भूख प्यास से तड़प रही जनता, ढूँढ रही है इंसानियत का धन। बाढ़ का दानव निर्दयी बनकर, जीवन का हर रंग छीन लेता, फिर भी उम्मीद का दीप जलता— मनुष्य हर बार खड़ा हो जाता। पेड़ों की शाखें टूट रही हैं, चिड़ियों के घोंसले बह रहे, धरती माँ की छाती फटती, पुत्र उसके विलाप कर रहे। किसान की मेहनत मिट्टी में, पसीने की गंध भी खो गई, धान, गेंहूँ, सब जल में बहकर, किस्मत की धूल में सो गई। स्कूलों की घंटियाँ थम गईं, बच्चे अब नावों में पढ़ते हैं, भविष्य की किताबें भीगीं, सपनों के पन्ने सड़ते हैं। बाज़ार की गलियाँ डूबीं, चौपाल की आवाज़ें गुम, हर ओर पसरी वीरानी, मानव का जीवन है अधरूम। रातें भी अब काली लगतीं, दीपक की लौ भी बुझ जाती, तिनकों सी आशाएँ टूटें, हर साँस करुणा में डूब
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