ये जिंदगी
ये जिंदगी, तू क्यों खापा खापा सी है, क्या हमने तुझसे कुछ ज़्यादा उम्मीद लगा ली है? वो खुशियाँ, वो मुस्कान जो मांगी थी हमने, क्या उनकी कीमत ज्यादा तो नहीं चुका दी है? ये वक्त, तू क्यों रुका रुका सा लगता है, क्या हमने तुझसे कुछ ज्यादा वक्त मांगा है? क्या हमने चाहा था तुझे थोड़ा संभल कर, और तू भाग चला अपने ही रस्तो पर? ये आंखें, क्यू नामी नामी सी है, क्या हमने सपनों का बोझ ज्यादा उठाया है? वो ख्वाब जो रातों को सजाते थे आसमान में, क्या उनका बोझ दिन के उजाले में संभल नहीं पाया? पर जिंदगी, रुकना तो हमने सीखा ही नहीं, तेरे संग चलने का इरादा अब भी कम नहीं। वक़्त, तू चाहे जितना तेज़ भाग ले, हम हर मोड़ पर तेरा पीछा करेंगे। और सपने, तुम छोड़ दोगे तो क्या? हम नए सपने देख कर उन्हें हकीकत बना लेंगे। जिंदगी के हर दौर में, चाहे अँधेरा हो या रोशनी, हम अपनी मंजिल तक का रास्ता खुद बना लेंगे।
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