सब कुछ तुम्हारे हिसाब से हो
सब कुछ तुम्हारे हिसाब से हो, ये जरूरी नहीं। जिन्दगी एक पहेली है, कोई खुली किताब नहीं। ये कमबख्त जमाना भी, बडे रंग बदलता है , तुम्हारे नाकामयाबी के जख्मों पर, "काश" और " अगर "का नमक छिड़कता है। लेकिन ये बदलते समय का दस्तूर है, गलती इसमें जमाने की भी नहीं। जिंदगी एक पहेली है, कोई खुली किताब नहीं। इतनी सी बात ,न जाने क्यों? तुम्हारे जहन में बस्ती नहीं, कि, किसी की जीत का मतलब, तुम्हारी हार तो बिल्कुल नहीं। सब कुछ तुम्हारे हिसाब से हो, ये जरूरी नहीं। कौन कहता है, आंसू बहाना वाजिब नहीं, जनाब, जब चोट अपने दे न तब आंसू से बड़ी कोई दवाई नहीं। हुनर देख , हैरान हूँ मैं इस जमाने का कि सच लगे यहाँ करेले सा कडवा , और झूठ से बड़ी यंहा कोई मिठाई नहीं। जिन्दगी एक पहेली है, कोई खुली किताब नहीं। कहानी लम्बी है इस जमाने की , पूरी अब तक मैंने कही नहीं। अच्छे वक्त में, यहाँ साथ होंगे सब तुम्हारे, लेकिन बूरे वक्त में, यहाँ साथ देती परछाई भी नहीं। खैर ये जमाने की हवा है , गलती इनकी भी नहीं। सब कुछ यहाँ तुम्हारे हिसाब से हो, ये जरूरी भी नहीं। इस जिन्दगी की कस-मकस में खुद को बदलना नहीं, ये कहानी तुम्हारी है, किसी और की नहीं। एक इन्सान अच्छा , तुम्हारे अन्दर भी छिपा बैठा है, बस ध्यान रहे इस जिन्दगी की दौड़ में, उसे जगाना है, मिटाना नहीं। जिन्दगी एक पहेली है, कोई खुली किताब नहीं।
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